वीर वधू
सुनो, शायद अब मैं लौट के नहीं आऊंगी
और अगर आ भी गई तो
एक केसरी रंग का कफन अपने साथ लाऊंगी।
पर देखो तुम रोना मत मुझ पर जो गर्व है
उसको खोना मत और सुनो, मेरे बच्चों से कहना
अब वो दरवाजे पर खड़े होकर मेरा इन्तजार ना करें।
माँ होकर मुझे धरती माँ के लिए शहीद होने से इन्कार ना करें। मैंने अपनी गाँव की गलियों में काफी वक्त गुजारा है
उनके लिए अब मेरा कफन ही आखिरी सहारा है।
कहने को तो मुझ पर पहला हक तुम्हारा ही है,
पर माफ़ करना, मुझे आपके पापा का आधा-अधूरा फर्ज पूरा करना है
अतः एक फौजी को सिर्फ वतन ही प्यारा
बच्चों, मुझे खोने का अफसोस ना करना ।
क्योंकि मैं मरी नहीं हूँ, शहीद हुई हूँ,
तुम्हारे दिलों में अभी भी जिंदा है।
तुम फिक्र मत करना साथ हूँ तुम्हारे.....
उस तिरंगे को देखना जब भी याद आऊँ क्यों कि
मैं उसमें अभी भी आबाद हूँ।
मैं मिट्टी की कीमत जानती हूँ
इसलिए वीरवधू कहलाती हूँ "वीरवधू' कहलाती है।
✍️महिला (आरक्षक) वर्षा किसन ससाणे.
बीएसएफ

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